अभी भी प्रिय
अरविंद केजरीवाल

जब पहली बार ये खबर मिली थी कि तुम नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में शीला दीक्षित से आगे चल रहे हो, तो ऐसी हुलस कर खुशी हुई थी कि जैसी 77 में इंदिरा गांधी की राजनारायण के हाथों हार पर मेरे बाबा को हुई होगी. मगर उसके बाद जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर लग रहा है, जैसे सूरज बड़जात्या की पिक्चर के चक्कर में हॉल में फंस गए हों. फिल्म अच्छी है, गाने हैं, एक्शन हो चुका है, ड्रामा भी है. मगर ये इत्ती लंबी है कि मन कुसकुटा रहा है कि कब खत्म हो और कुछ ताजादम हवा आए.

खैर, मैं आपको अपनी ही सुनाता हूं. ट्रेन से दफ्तर आता हूं. मेट्रो वाली ट्रेन. चुनाव के पहले, उस ट्रेन में जब भी किसी से पूछता, क्या माहौल है. ज्यादातर कहते, इस बार तो झाड़ू है. बड़ा अच्छा लगता सुनकर. फिर जब चुनाव आए, तो लगा कि सर्वे झूठे थे, मेट्रो पर सवार जनता सच्ची थी. मगर अब उसी ट्रेन में सब भुनभुनाते हैं कि ये केजरीवाल सरकार क्यों नहीं बनाते हैं. और हां सर जी. बिजली के बिल अभी भी बढ़े हुए ही आते हैं.

मेरा स्वार्थ कुछ छोटा था. सोचता था कि झाड़ू वाले आएंगे तो मंगू सिंह को भी ठीक कर देंगे. मंगू सिंह जब से दिल्ली मेट्रो के हेड बने हैं ये ट्रेन बहुत रुक रुककर चलने लगी है. मगर ये क्या. आप भी मेट्रो से सितमगर निकले. चल तो रहे ही नहीं हैं. बस कुछ खिसकते हैं, चलने का भरम देते हैं और चिंचिंया के फिर रुक जाते हैं.

आपने कहा, हम विपक्ष में बैठेंगे. हमने कहा, स्वागत है, सत्ता संभालने का जनादेश भी नहीं मिला. फिर फाइनल पिक्चर देखकर लगा कि एक ही सूरत बनती है. बीजेपी आपके साथ और कांग्रेस बीजेपी के साथ किसी भी कीमत पर नहीं आ सकती. घोड़े और घास की यारी वाला मामला हो जाता. तो आप सरकार बनाते और इसके लिए कांग्रेस बाहर से समर्थन को तैयार हो गई. बीजेपी ने भी रचनात्मक सहयोग की बात कही. हमारे कानपुर की कहावत सा मामला था ये आपके लिए. चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी. अंटा मेरे बाप का. मगर सबका बाप बनने के फेर में आप राजनैतिक दूरंदेशी न दिखा पाए.

पहले तो मना करते रहे, मगर जब लगा कि अब हां भी की जा सकती है, तो भूमिका बनाने लगे. दोनों दलों को चिट्ठी लिखी और कहा कि आप समर्थन दे रहे हैं, मगर पहले इन 18 मुद्दों पर जवाब दीजिए. और कमाल ये किया कि जिनसे जवाब मांगा उनको पहली ही लाइन में महाभ्रष्ट कह खारिज कर दिया. इसे कहते हैं दरेरा देकर काम लेना. बहरहाल, ये तमाशा भी पूरा हुआ और इसके बाद अब आप कह रहे हैं कि दिल्ली की जनता से पूछेंगे.

कैसे पूछेंगे. चिट्ठी लिखेंगे, पूरी 25 लाख. सुनकर ही गब्बर वाला फील आता है. मगर इस चिट्ठी का संदेश न पहुंचा तो. एसएमएस मंगवाएंगे. बीजेपी या कांग्रेस वालों ने बदमाशी कर दी और बल्क में फोन कॉलिंग वालों से एसएमएस गिरवा दिए तो! वैसे भी आप एसएमएस वाली एक कंपनी के मालिक अंबानी के खिलाफ मोर्चा खोले हैं. आप वेबसाइट पर पूछेंगे. यहां मोदी की साइबर आर्मी खेल खराब कर सकती है. फेसबुक पर पूछेंगे. पर इसमें दिक्कत तुर्की में छुट्टी मना रहे चचा गहलोत से है. वह एकमुश्त लाइक गिरवा सकते हैं वहां से.

मोहल्ला सभा में जाएंगे. हाथ उठवाएंगे और फिर गिनती कर उसी जनता को बताएंगे. हमें ये भी पता है कि आप इस ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे वाले सनम हैं और सरकार जरूर बनाएंगे. पर उसके पहले कितना झिलाएंगे, इंतजार करवाएंगे.

आपकी पार्टी के 'दिग्ग'ज कुमार विश्वास कहते हैं कि यही लोकतंत्र है. तो एक बताओ सर जी, जनता के पास जाने के नाम पर आप कितने फैसलों को कितनी बार टालोगे. एक उदाहरण से बात समझते हैं. आप कहते हैं कि सभी को 700 लीटर पानी मुफ्त देंगे. आप सीएम बन गए और जल अथॉरिटी वालों के साथ मीटिंग की. एक्सपर्ट भी बैठे और आखिरी में यह बात बनी कि 700 तो नहीं, मगर 650 लीटर पानी दिया जा सकता है. तब आप फिर चिट्ठी लिखेंगे, एसएमएस करेंगे और वोटिंग करवाएंगे कि हमने तो 700 कहा था, पर अब 650 ही दे पा रहे हैं, दें कि न दें. मतलब हर फैसले के लिए जनता के पास जाएंगे.

आप इसे स्वराज कह सकते हैं, लोकतंत्र की मजबूती कह सकते हैं. मगर मेरी समझ ये कहती है कि अगर चीज का फैसला हाथ उठाकर ही होना होता, तो इस देश से कभी सती प्रथा न जाती. कभी विधवा विवाह स्वीकृत न होते. बाल विवाह अभी तक ढोए गए होते. बहुमत हमेशा यथास्थितिवाद और फ्री की रेवड़ियों के पक्ष में रहता और उसके फेर में देश की लंका लग जाती. आपके हिसाब से तो पूरी की पूरी लगी ही है, खैर.

आपने दिल्ली की जनता की राय पूछी है, सो अपनी राय बता रहा हूं. सरकार बनाइए सरकार. बनाइए और जितने भी वक्त चलाइए कुछ काम कर दिखाइए. वरना लोग कहेंगे कि बड़ी बातें छौंकनी आती थीं बस. जब करने की बेरा आई तो बास मार गए.

पिछली तीन प्रेस कॉन्फ्रेंस से देख रहा हूं कि आपकी खांसी बहुत बढ़ गई है. तमाम आलोचनाओं के बावजूद मुझे, मेरे देश को आपके जैसे नेताओं की जरूरत है. इसलिए अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखिए. अदरक, काली मिर्च और तुलसी वाली चाय पीजिए और हो सके तो मंचीय कविता सुनने से परहेज करिए. ये वाह वाह की आदी बना देती है.

आपका
आम आदमी
 
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