बाल मजदूरी हटाओ!
छोटू दो कप चाय ले आओ।

हम दे सकते है सिर्फ नारे,
पर अपनी परेशानी तो जानते है ये ही बेचारे।

घर मेँ बिमार माँ
बाप है निकम्मा
छोटू अगर नहीँ कमायेगा
शाम का खाना उसके घर कैसे बन पायेगा??

माँ भुट्टा बेचती थी,बच्चो के बारे मेँ सोचती थी।
पुलिस भुट्टा बेचने नहीं देती थी,
मुफ्त का भुट्टा नोचती थी।
जब पेट की आग लगती थी,
जब भूख से वो तड़पती थी,
तब जिगर का टुकड़ा याद आया,
वो चन्द पैसे कमा लाया,
फिर घर का चूल्हा जला था।
तब पेट की आग बुझी थी।

किसी का बाप सड़क किनारे समोसे बेचता था।
पुलिस से बंधा हफ्ता था,
जब पुलिस कॅ नजराना ना चढ़ा पाया,
तो जालिमों ने रेहड़ी उसकी पलटी थी।
कढ़ाई,कटोरे,छलनी­-कलछुल सब कुछ नाले मेँ फेंकी थी।
अब कुछ और अभागे के पास ना पुंजी थी...
तो इस छोटु के रुप की कुँजी थी...
तब छोटी ही कमाई की पुँजी थी...

जब छोटू हमेँ चाय पिलाता,
तब चूल्हा उसके घर का जलता था!
तब चूल्हा घर का जलता था।

ना माँगी उसने भिक्षा
ना पाई उसने शिक्षा
बस चाय हमेँ पिलाया है....
दंभ ठोकती राजनिती हमने बाल मजदूरी हटाया है....

जो बाल मजदूरी हटवाते है!
वही छोटू से चाय मँगवाते है!
 
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