आज इस पोस्ट को लिखने के बाद यदि मेरी यह आई.डी भी तुरंत बंद हो जाए तो मुझे कोई हैरत नही होगी मगर मेरा फेसबुक का इतिहास रहा हैं कि जब भी मैंने कभी किसी विषय पर चिंतन ,मंथन और मनन करने का प्रयास किया हैं और जागरूकता की बात की हैं मुझे इसका हर बार खामियाजा उठाना पड़ा हैं ..मैं इस पोस्ट के जरिये किसी भी धर्म एवं जाति विशेष को लक्षित नही कर रहा हूँ ,बल्कि मैं इस पोस्ट के जरिये यह जानने का प्रयास कर रहा हूँ कि मजहब के नाम पर ये मजहब के ठेकेदार क्यों मासूमो की जिंदगियो के साथ इतनी बर्बरता करते हैं ? इन्हें यह हक किसने दिया ?

अपनी कट्टरता और बर्बरता के लिए कुख्यात ''इस्लाम '' के कुछ मजहबी ठेकेदारों ने एक मुस्लिम युवती का सिर सिर्फ इसलिए कलम कर दिया क्योकि उसने गैर मजहब में शादी कर ली थी..ओनर किलिग़ का यह कोई पहला मामला नही हैं , ऐसा नही कि इस्लाम में ही सिर्फ ऐसी दरिंदगी होती हैं ,कुछ जगह हिंदू समाज में भी इसी तरह के कारनामे देखने को मिलते हैं ..खासतौर से पश्चिमी यू.पी में ...हर धर्म में मुहब्बत को सबसे पहला दर्जा दिया जाता हैं ,फिर मुहब्बत के नाम पर यह बदनुमा दाग क्यों ? इसमें किसका कसूर सबसे ज्यादा हैं ? मुहब्बत का ? मजहब का ? मुहब्बत के दुश्मन और धर्म के ठेकेदारों का ? युवती का ? युवक का ? या फिर उनके मातापिता का जिन्होंने उन्हें जन्म दिया ? क्योकि एक तरफ तो आज घर में संस्कार नाम की कोई चीज देखने को ही नही मिलती दूसरी तरफ कुछ संस्कारित घर हैं भी तो आज की युवा पीढ़ी अपने आपको बहुत मोडर्न दिखाने के लिए अपने माँ बाप की नही सुनते और उन्हें दकियानूस कहकर अपमानित करने से भी नही चूकते....

जबकि हकीकत यह हैं कि एक बाप अपनी सुपुत्री का विवाह अपनी सामर्थ्य और हैसियत के हिसाब से करता हैं और उचित दान दहेज भी देता हैं , जिसमे बिस्तर से लेकर चूल्हा तक और घर ग्रहस्थी में उपयोग होने वाली सभी वस्तुए देता हैं..फिर आखिर उन बेटियों को अपने माँ बाप का वों वात्सल्य क्यों नजर नही आता , जिसमे वों अपना महबूब तलाशती हैं ???? मुहब्बत कोई गुनाह नही हैं और ना ही मैं इसका विरोधी हूँ ..मगर एक दोराहे पर आकर अक्सर निःशब्द हो जाता हूँ कि मुहब्बत इतनी अंधी क्यों और कैसे हो जाती हैं ,जिसमें उन्हें अपने माँ बाप और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नही दिखती ? क्या पहली नजर का प्यार जो सिर्फ विपरीत लिंगी आकर्षण हैं , माँ बाप के लिए परेशानी का सबब नही ????? मैंने भी मुहब्बत की हैं और आपने भी की होगी मगर मुझे अपने माँ बाप से मुहब्बत पहले हैं इसलिए चाहकर भी प्रेम विवाह नही किया ..

सवाल ये हैं कि ऐसी जिन्दगिया कब तक ऐसी बर्बरता झेलती रहेंगी ? दोष आखिर किसका हैं ? और यदि गैर मजहब में विवाह कर भी लिया तो यह धर्म के ठेकेदार कौन होते हैं जो इस तरह का दुस्साहस करते हैं ??? सवाल कई हैं जिनके द्वंद में मेरी कलम एक मझधार में फंस गयी हैं और शब्दों के बवंडर मुझे इस तूफ़ान से निकलने नही दे रहे ..आप एक कुशल केवट की तरह मेरी कलम को एक सही साहिल के मुकाम तक ले चलिए .........

वन्देमातरम

अमित तेवतिया '' निःशब्द ''




 
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