आज अगर ख़ामोश रहे तो ....

नए वर्ष के नई सुबह का कौन नया इतिहास
लिखेगा ?

श्वान-भेड़िए , सिंहद्वार पर आकर फिर
ललकार रहे हैं

साँप-सपोले चलती ’बस’ में रह रह कर
फुँफकार रहे हैं

हर युग में दुर्योधन पैदा ,हर युग में दु:शासन
ज़िंदा

द्रुपद सुता का चीर हरण ये करते बारम्बार
रहे हैं

आज अगर ख़ामोश रहे तो ......

गली गली में दु:शासन का फिर कैसे संत्रास
मिटेगा ?

जनता उतर चुकी सड़कों पर अब
अपना प्रासाद संभालो !

चाहे आंसू गोले छोड़ो ,पानी की बौछार
चला लो

कोटि कोटि कंठों से निकली नहीं दबेंगी ये
आवाज़ें

चाहे लाठी चार्ज़ करा दो ’रैपिड एक्शन
फ़ोर्स’ बुला लो

आज अगर ख़ामोश रहे तो ....

सत्ता की निर्ममता का फिर कौन
भला विश्वास करेगा ?

हे अनामिके ! व्यर्थ तेरा वलिदान नहीं हम
जाने देंगे

जली हुई कंदील नहीं अब बुझने या कि बुझाने
देंगे

इस पीढ़ी पर कर्ज़ तुम्हारा शायद
नहीं चुका पायेंगे

लेकिन फूल तुम्हारे शव का कभी नहीं मुरझाने
देंगे

आज अगर ख़ामोश रहे तो .....

आने वाले कल का बोलो कौन नया आकाश
रचेगा ?

कौन नया इतिहास लिखेगा ?
 
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