नथुराम विनायक गोडसे ( जन्म: १९ मई१९१० - फाँसी: १५ नवम्बर १९४८) : एकपत्रकार, हिन्दू राष्ट्रवादी औरभारतीय स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे।इनका सबसे अधिक चर्चित कार्यगान्धी का वध था क्योंकि भारत केविभाजन और उस समय हुई साम्प्रदायिकहिंसा में लाखों हिन्दुओं की हत्या के लियेलोगगान्धी को ही उत्तरदायी मानते थे।यद्यपि उन्होंने इससे पूर्व भारतीयस्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्धसंघर्ष भी किया था और कुछ समय तकअखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसतथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़ेरहे, परन्तु बाद में वे अखिल भारतीयहिन्दू महासभा में चले गये।प्रारम्भिक जीवन -नथुराम गोडसे का जन्म १९ मई १९१०को भारत के महाराष्ट्र राज्य में पुणे केनिकट बारामती नमक स्थान परचित्तपावन मराठी ब्रह्मण परिवार मेंहुआ था। इनके पिता विनायक वामनरावगोडसे पोस्ट आफिस में काम करते थे औरमाता लक्ष्मी गोडसे सिर्फ एकगृहणी थीं। नथुराम के जन्म का नामरामचन्द्र था। इनके जन्म से पहले इनकेमाता-पिता की सन्तानों में तीनपुत्रों की अल्पकाल में ही मृत्युहो गयी थी केवल एक पुत्री ही जीवितबची थी। इसलिये इनके माता-पिता नेईश्वर से प्रार्थना की थी कि यदि अबकोई पुत्र हुआ तो उसका पालन-पोषणलड़की की तरह किया जायेगा।इसी मान्यता के कारण इनकी नाक बचपनमें ही छेद दी और नाम भी बदल दिया।बाद में ये ‘नाथूराम’ विनायक गोडसे केनाम से प्रसिद्ध हुए।बचपन -इनकी बचपण से ही धार्मिक कार्यों मेंगहरी रुचि थी। इनके छोटे भाई गोपालगोडसे के अनुसार ये बचपन मेंध्यानावस्था में ऐसे-ऐसे विचित्र श्लोकबोलते थे जो इन्होने कभी भी पढ़ेही नहीं थे। ध्यानावस्था में ये अपनेपरिवारवालों और उनकी कुलदेवी के मध्यएक सूत्र का कार्य किया करते थे परन्तुयह सब १६ वर्ष तक की आयु तक आते-आतेस्वत: समाप्त हो गया।यद्यपि इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पुणे मेंहुई थी परन्तु भारत केस्वतन्त्रता संग्राम के आन्दोलन सेप्रभावित होकर हाईस्कूल के बीच मेंही अपनी पढाई-लिखाई छोड़दी तथा उसके बाद कोई औपचारिकशिक्षा नहीं ली। धार्मिक पुस्तकों मेंगहरी रुचि होने के कारण रामायण,महाभारत, गीता, पुराणों के अतिरिक्तस्वामी विवेकानन्द,स्वामी दयानन्द ,बाल गंगाधर तिलकतथा महात्मा गान्धी के साहित्यका इन्होंने गहरा अध्ययन किया था।राजनैतिक जीवन -अपने राजनैतिक जीवन के प्रारम्भिकदिनों में नथुराम अखिल भारतीय कांग्रेससे जुड़े रहे थे परन्तु बाद में वे राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ में शामिल हो गये। अन्त में१९३० में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी छोड़दिया और अखिल भारतीय हिन्दूमहासभा में चले गये। उन्होंनेअग्रणी तथा हिन्दू राष्ट्र नामकदो समाचार-पत्रों का सम्पादनभी किया था। वे मुहम्मदअली जिन्ना की अलगाववादी विचार-धारा का विरोध करते थे। प्रारम्भ मेंतो उन्होंने मोहनदास करमचंद गांधी केकार्यक्रमों का समर्थन किया परन्तु बादमें गान्धी के द्वारा लगातार और बार-बार हिन्दुओं के विरुद्ध भेदभाव पूर्णनीति अपनाये जाने तथा मुस्लिमतुष्टीकरण किये जाने के कारण वेगान्धी के प्रबल विरोधी हो गये।हैदराबाद आन्दोलन -१९४० में हैदराबाद के तत्कालीन शासकनिजाम ने उसके राज्य में रहने वालेहिन्दुओं पर बलात जजिया कर लगानेका निर्णय लिया जिसका हिन्दूमहासभा ने विरोध करने का निर्णयलिया। हिन्दू महासभा के तत्कालीनअध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर केआदेश पर हिन्दू महासभा के कार्यकर्ताओंका पहला जत्था नथुराम गोडसे के नेतृत्वमें हैदराबाद गया। हैदराबाद के निजामने इन सभी को बन्दी बना लिया औरकारावास में कठोर दण्ड दिये परन्तु बादमें हारकर उसने अपना निर्णय वापस लेलिया।भारत-विभाजन -१९४७ में भारत का विभाजन और विभाजनके समय हुई साम्प्रदायिक हिंसा नेनाथूराम को अत्यन्त उद्वेलित कर दिया।तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुएबीसवीं सदी की उस सबसे बडी त्रासदी केलिये मोहनदास करमचन्दगान्धी ही सर्वाधिक उत्तरदायी समझ मेंआये।गान्धी-वध की पृष्ठभूमि -विभाजन के समय हुए निर्णय के अनुसारभारत द्वारा पकिस्तान को ५५ करोड़रुपये देने थे, जिसमें से २० करोड़ दिएजा चुके थे। उसी समय पकिस्तान ने भारतके कश्मीर प्रान्त पर आक्रमण करदिया जिसके कारण भारत के तत्कालीनप्रधानमन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरूऔर गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल केनेतृत्व में भारत सरकार ने पकिस्तानको ५५ करोड़ रुपये न देने का निर्णयकिया, परन्तु भारत सरकार के इसनिर्णय के विरुद्ध गान्धी अनशन पर बैठगये। गान्धी के इस निर्णय से क्षुब्धनाथूराम गोडसे और उनके कुछ साथियों नेगान्धी का वध करने का निर्णय लिया।प्रथम प्रयास विफल -गान्धी के अनशन से दुखी गोडसे तथा उनकेकुछ मित्रों द्वारा गान्धी-वधकी योजनानुसार नैई दिल्ली केबिरला हाउस पहुँचकर २० जनवरी १९४८को मदनलाल पाहवा नेगान्धी की प्रार्थना-सभा में बम फेका।योजना के अनुसार बम विस्फोट से उत्पन्नअफरा-तफरी के समयही गान्धी को मारना था परन्तु उससमय उनकी पिस्तौल ही जाम हो गयी वहएकदम न चल सकी। इस कारण नाथूरामगोडसे और उनके बाकी साथी वहाँ सेभागकर पुणे वापस चले गये जबकि मदनलालपाहवा को भीड ने पकड कर पुलिस केहवाले कर दिया।शस्त्र की व्यवस्था-नाथूराम गोडसे गान्धी को मारने के लियेपुणे से दिल्ली वापस आये और वहाँ परपकिस्तान से आये हुए हिन्दू तथा सिखशरणार्थियों के शिविरों में घूम रहे थे।उसी दौरान उनको एक शरणार्थी मिला,जिससे उन्होंने एकइतालवी कम्पनी की बैराटा पिस्तौलखरीदी। नाथूराम गोडसे ने अवैध शास्त्ररखने का अपराध न्यायालय में स्वीकारभी किया था। उसी शरणार्थी शिविर मेंउन्होंने अपना एक छाया-चित्र (फोटो)खिंचवाया और उस चित्र को दो पत्रों केसाथ अपने सहयोगी नारायण आप्टे को पुणेभेज दिया।३० जनवरी १९४८ को नाथूराम गोडसेदिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना-सभा के समय से ४० मिनट पहले पहुँच गये।जैसे ही गान्धी प्रार्थना-सभा के लियेपरिसर में दाखिल हुए, नाथूराम ने पहलेउन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया उसकेबाद बिना कोई बिलम्ब कियेअपनी पिस्तौल से तीन गोलियाँ मार करगान्धी का अन्त कर दिया। गोडसे नेउसके बाद भागने का कोई प्रयासनहीं किया।हत्या अभियोग-नाथूराम गोडसे पर मोहनदास करमचन्दगान्धी की हत्या के लिये अभियोग पंजाबउच्च न्यायालय में चलाया गया था। इसकेअतिरिक्त उन पर १७ अन्य अभियोगभी चलाये गये। किन्तु इतिहासकारों केमतानुसार सत्ता में बैठे लोगभी गान्धी जी की हत्या के लिये उतनेही जिम्मेवार थे जितने कि नाथूरामगोडसे या उनके अन्य साथी। इस दृष्टि सेयदि विचार किया जाये तो मदनलालपाहवा को इस बात के लिये पुरस्कृतकिया जाना चाहिये था ना कि दण्डितक्योंकि उसने तो हत्या-काण्ड से दस दिनपूर्व उसी स्थान पर बम फोडकर सरकारको सचेत किया था कि गान्धी, जिन्हेंबडी शृद्धा से नेहरू जी बापू कहते थे, अबसुरक्षित नहीं;उन्हें कोईभी प्रार्थना सभा में जाकर शूट करसकता है।गान्धी-वध के कारण -गान्धी-वध के मुकद्दमें के दौरानन्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम नेअपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनानेकी अनुमति माँगी थी और उसे यहअनुमति मिली थी। नाथूराम गोडसेका यह न्यायालयीन वक्तव्य भारतसरकार द्वारा प्रतिबन्धित करदिया गया था। इस प्रतिबन्ध के विरुद्धनाथूराम गोडसे के भाई तथा गान्धी-वधके सह-अभियुक्त गोपाल गोडसे ने ६०वर्षों तक वैधानिक लडाई लड़ी और उसकेफलस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने इसप्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उसवक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दी।नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के समक्षगान्धी-वध के जो १५० कारण बताये थेउनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं : -क्रमांकित सूची आइटम-1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़गोली काण्ड (१९१९) से समस्तदेशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थेकि इस नरसंहार के नायक जनरल डायरपर अभियोग चलाया जाये। गान्धी नेभारतवासियों के इस आग्रह को समर्थनदेने से स्पष्ठ मना कर दिया।2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्डके निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था वगान्धी की ओर देख रहा था, कि वहहस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु सेबचायें, किन्तु गान्धी ने भगत सिंहकी हिंसा को अनुचित ठहराते हुएजनसामान्य की इस माँग को अस्वीकारकर दिया।3. ६ मई १९४६को समाजवादी कार्यकर्ताओं को दिये गयेअपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीगकी हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देनेकी प्रेरणा दी।4. मोहम्मदअली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिमनेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए१९२१ में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलनको समर्थन देने की घोषणा की।तो भी केरल केमोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओंकी मारकाट की जिसमें लगभग १५००हिन्दू मारे गये व २००० से अधिकको मुसलमान बना लिया गया। गान्धी नेइस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन्खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूपमें वर्णन किया।5. १९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गएशुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्दकी अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक नेहत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूपगान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाईकह कर उसके इस कृत्य को उचितठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गलराष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दू-मुस्लिमएकता के लिये अहितकारी घोषित किया।6. गान्धी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी,महाराणा प्रताप व गुरू गोबिन्द सिंहको पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।7. गान्धी ने जहाँ एक ओर कश्मीर केहिन्दू राजा हरि सिंह को कश्मीरमुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने वकाशी जाकर प्रायश्चित करनेका परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओरहैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दूबहुल हैदराबाद में समर्थन किया।8. यह गान्धी ही थे जिन्होंने मोहम्मदअली जिन्ना को कायदे-आज़मकी उपाधि दी।9. कांग्रेस के ध्वज निर्धारण के लियेबनी समिति (१९३१) ने सर्वसम्मति सेचरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णयलिया किन्तु गान्धी की जिद के कारणउसे तिरंगा कर दिया गया।10. कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन मेंनेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत सेकॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तुगान्धी पट्टाभि सीतारमय्या का समर्थनकर रहे थे, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तरविरोध व असहयोग के कारण पद त्यागदिया।11. लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेलका बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तुगान्धी की जिद के कारण यह पदजवाहरलाल नेहरु को दिया गया।12. १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली मेंआयोजित अखिल भारतीय कांग्रेससमिति की बैठक में भारत विभाजनका प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था,किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्तावका समर्थन करवाया। यह भी तबजबकि उन्होंने स्वयं ही यहकहा था कि देश का विभाजन उनकी लाशपर होगा।13. जवाहरलाल की अध्यक्षता मेंमन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिरका सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माणका प्रस्ताव पारित किया, किन्तुगान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्यभी नहीं थे;ने सोमनाथ मन्दिर परसरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्तकरवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरणअनशन के माध्यम से सरकार परदिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे सेपुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।14. पाकिस्तान से आये विस्थापितहिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों मेंजब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उनउजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ वबालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहरठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूरकिया गया।15. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान नेकश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्वमाउण्टबैटन ने भारत सरकार सेपाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपयेकी राशि देने का परामर्श दिया था।केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण केदृष्टिगत यह राशि देने को टालनेका निर्णय लिया किन्तु गान्धी नेउसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने केलिए आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसकेपरिणामस्वरूप यह राशि पाकिस्तानको भारत के हितों के विपरीत देदी गयी।मृत्युदण्ड-नाथूराम गोडसे को सह-अभियुक्त नारायणआप्टे के साथ १५ नवम्बर १९४९ को पंजाबकी अम्बाला जेल में फाँसी पर लटका करमार दिया गया। उन्होंने अपने अन्तिमशब्दों में कहा था : -"यदि अपने देश के प्रति भक्तिभावरखना कोई पाप है तो मैंने वह पापकिया है और यदि यह पुण्य है तो उसकेद्वारा अर्जित पुण्य पद पर मैंअपना नम्र अधिकार व्यक्त करता हूँ"– नथुराम विनायक गोडस
 
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