2002 के गुजरात के दंगों को न्यूनतम जन हानि के साथ मोदी ने संभाला
इसके बाद आज तक गुजरात में कर्फ्यू भी नहीं लगा
गुजरात में कांग्रेस के राज में कर्फ्यू हर दस पन्द्रह दिन में लगना आम बात थी
पर मीडिया पिछले बारह साल से आलाप रहा है

" मोदी के दामन पर खूनी दाग हैं "

और काले अंग्रजों की अम्मा चिल्लाती रही

" मौत का सौदागर है "

सांप्रदायिक सौह्र्द्य का मीडिया का सहयोग का दूसरा स्वरूप भी देखिये

सांप्रदायिक सौह्र्द्य बनाने में सहयोग की ताज़ी झलक
आसाम के में दो महीने तक दंगे चलते रहे
और मीडिया केवल इतना बतलाता रहा केवल 34 लोग मरे हैं हालत काबू में हैं
जब केवल 34 लोग मरे दो महीने में
तो चार लाख लोगो कैसे बेघर हुए कोई समझाए मुझे ?
जिनके लिए रिलीफ फंड इकट्ठा किया जा रहा है
वह भी मीडिया में एड व्दारा मतलब मीडिया की कमाई
केंद्र सरकार के पास वोट बैंक के लिए फंड है
पर पीडत हिन्दुओं के लिए नहीं , रिलीफ फंड इक्कठा कर रहे हैं

सांप्रदायिक सौह्र्द्य का मीडिया का सहयोग का तीसरा स्वरूप भी देखिये

गृह मंत्रालय कि जानकारी हिसाब से

"1984 से मई 2012 तक देश में कुल 26817 दंगे हुए..
जिनमे कुल 12902 लोगों ने अपनी जाने गंवाई.... "

इन दंगों में से लगभग अधिकांश दंगे
अधिकांश क्या दो चार छोड़ सभी दंगे कांग्रेस शासित राज्यों में हुए

"जो देश की जनता को न याद हैं न मालूम हैं की देश में इतने दंगे हुए हैं और कितने मरे "

पर पूरे देश को गुजरात के दंगे याद हैं क्यों ?
सांप्रदायिक सौह्र्द्य के किये देश हित में
क्या सचमुच यह मीडिया का त्याग था ?
या मीडिया ने कांग्रेस की इज्जत बचाई और हिन्दुओं की लुटवाई

यही वजह है की " ख़ामोशी के मियां मिट्टू "
आज मीडिया के लिए अपनी ख़ामोशी तोड़ते हुए कहते हैं

" मीडिया ने सांप्रदायिक सौह्र्द्य के लिए सहियोग दिया है "

इस तरह का सहयोग मीडिया करता था करता है और करता रहेगा

देशवासियों जागो और इन गद्दारों को पहचानों
 
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